श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 249
 
 
श्लोक  2.1.249 
इत्थं सर्वावतारेभ्यस् ततो’प्य् अत्रावतारिणः ।
व्रजेन्द्र-नन्दने सुष्ठु माधुर्य-भर ईरितः ॥२.१.२४९॥
 
 
अनुवाद
"इस प्रकार यह समझाया गया है कि कृष्ण में माधुर्य की मात्रा सभी अवतारों और अवतारों के स्रोत महाविष्णु से भी अधिक है।"
 
"Thus it is explained that the amount of sweetness in Krishna is greater than even Maha Vishnu, the source of all incarnations and avataras."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)