श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 247-248
 
 
श्लोक  2.1.247-248 
अष्टादश-महा-दोषाः, यथा विष्णु-यामले —
मोहस् तन्द्रा भ्रमो रुक्ष-रसता काम उल्बणः ।
लोलता मद-मात्सर्ये हिंसा खेद-परिश्रमौ ॥२.१.२४७॥
असत्यं क्रोध आकाङ्क्षा आशङ्का विश्व-विभ्रमः ।
विषमत्वं परापेक्षा दोषा अष्टादशोदिताः ॥२.१.२४८॥
 
 
अनुवाद
विष्णु-यामल में अठारह महान दोषों का उल्लेख किया गया है: "भ्रम, नींद, त्रुटि, प्रेम रहित भौतिक आसक्ति, दुख लाने वाली भौतिक वासना, चंचलता, नशा, ईर्ष्या, हिंसा, थकावट, परिश्रम, झूठ, क्रोध, लालसा, चिंता, सांसारिक मामलों में तल्लीनता, पूर्वाग्रह और दूसरों पर निर्भरता।"
 
The Vishnu-yamala mentions eighteen great vices: "delusion, sleep, error, material attachment without love, material lust that brings suffering, fickleness, intoxication, jealousy, violence, weariness, toil, falsehood, anger, craving, worry, absorption in worldly affairs, prejudice and dependence on others."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)