श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 244-245
 
 
श्लोक  2.1.244-245 
महावाराहे च —
सर्वे नित्याः शाश्वताश् च देहास् तस्य परात्मनः ।
हानोपादान-रहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥२.१.२४४॥
परमानन्द-सन्दोहा ज्ञान-मात्राश् च सर्वतः ।
सर्वे सर्व-गुणैः पूर्णाः सर्व-दोष-विवर्जिताः ॥२.१.२४५॥
 
 
अनुवाद
महा-वराह पुराण में इसकी पुष्टि इस प्रकार है: "भगवान के सभी शरीर शाश्वत हैं और भौतिक जगत में बार-बार प्रकट होते हैं। वे वृद्धि और ह्रास से रहित हैं। वे कभी भी पदार्थ से उत्पन्न नहीं होते। उनके सभी शरीर परम आनंद स्वरूप हैं, शुद्ध ज्ञान से युक्त हैं, सद्गुणों से युक्त हैं और सभी दोषों से रहित हैं।"
 
This is confirmed in the Maha-Varaha Purana as follows: "All the bodies of the Lord are eternal and appear again and again in the material world. They are devoid of increase and decrease. They are never produced from matter. All His bodies are supreme bliss, filled with pure knowledge, endowed with good qualities and free from all defects."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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