श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 241
 
 
श्लोक  2.1.241 
मिथो विरोधिनो’प्य् अत्र केचिन् निगदिता गुणाः ।
हरौ निरङ्कुशैश्वर्यात् को’पि न स्याद् असम्भवः ॥२.१.२४१॥
 
 
अनुवाद
"ऊपर सूचीबद्ध कुछ गुण परस्पर विरोधी हैं। यद्यपि ये विपरीत हैं, फिर भी कृष्ण में उनका अस्तित्व असंभव नहीं है, क्योंकि उनकी शक्तियाँ असीमित हैं।"
 
"Some of the qualities listed above are contradictory. Although they are opposite, their existence in Krishna is not impossible, because His powers are unlimited."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)