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श्लोक 2.1.237  |
यथा —
आः पापिन् यवनेन्द्र दर्दुर पुनर् व्याघुट्य सद्यस् त्वया
वासः कुत्रचिद् अन्ध-कूप-कुहर-क्रोडे’द्य निर्मीयताम् ।
हेलोत्तानित-दृष्टि-मात्र-भसित-ब्रह्माण्डाण्डः पुरो
जागर्मि त्वद्-उपग्रहाय भुजगः कृष्णो’त्र कृष्णाभिधः ॥२.१.२३७॥ |
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| अनुवाद |
| "हे पापी! यवनराज! हे मेंढक! आज, असफल होकर, किसी अँधेरे गड्ढे के कोने में अपना निवास बना ले। कृष्ण नामक काला सर्प तुझे पकड़ने के लिए वहाँ सतर्क खड़ा है। मैंने ऊपर की ओर एक दृष्टि मात्र से ही ब्रह्माण्ड रूपी पात्र को भस्म कर दिया है।" |
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| "O sinner! O king of the Yavanas! O frog! Today, having failed, take up residence in the corner of some dark pit. The black serpent named Krishna stands there alert to catch you. With a mere glance upwards, I have reduced the vessel of the universe to ashes." |
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