श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 236
 
 
श्लोक  2.1.236 
धीरोद्धतः —
मात्सर्यवान् अहङ्कारी मायावी रोषणश् चलः ।
विकत्थनश् च विद्वद्भिर् धीरोद्धत उदाहृतः ॥२.१.२३६॥
 
 
अनुवाद
“जो व्यक्ति ईर्ष्या, अहंकार, क्रोध, चंचलता और शेखी बघारने वाला स्वभाव प्रदर्शित करता है, उसे बुद्धिमान लोग धीरोद्धार (अभिमानी) कहते हैं।”
 
“A person who displays jealousy, arrogance, anger, fickleness and boastfulness is called arrogant by wise people.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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