श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 221
 
 
श्लोक  2.1.221 
हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्ण इति त्रिधा ।
श्रेष्ठ-मध्यादिभिः शब्दैर् नाट्ये यः परिपठ्यते ॥२.१.२२१॥
 
 
अनुवाद
"भगवान तीन रूप धारण करते हैं जिन्हें परम उत्तम, अधिक उत्तम और पूर्ण बताया गया है। नाट्यशास्त्र में इन्हें उत्तम, मध्यम और निकृष्ट बताया गया है।"
 
"The Lord assumes three forms which are described as the supreme, the more perfect and the perfect. In the Natyashastra these are described as the best, the middle and the worst."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)