श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.1.208 
यथा —
पूर्ण-परमहंसं मां माधव लीला-महौषधिर् घ्राता ।
कृत्वा बत सारङ्गं व्यधित कथं सारसे तृषितम् ॥२.१.२०८॥
 
 
अनुवाद
हे माधव! यद्यपि मैं शुद्ध परमहंस हूँ, तथापि आपकी लीलाओं की महान औषधियों की सुगंध को सूँघकर, मैं भक्त बन गया हूँ और भक्ति रस का प्यासा हूँ।
 
O Madhava, though I am a pure Paramahamsa, yet smelling the fragrance of the great medicinal essence of Your pastimes, I have become a devotee and am thirsty for the nectar of devotion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)