श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 200
 
 
श्लोक  2.1.200 
यथा तत्रैव (१०.१४.११) —
क्वाहं तमो-महद्-अहं-ख-चराग्नि-वार्-भू-
संवेष्टिताण्ड-घट-सप्त-वितस्ति-कायः ।
क्वेदृग्-विधाविगणिताण्ड-पराणु-चर्या-
वाताध्व-रोम-विवरस्य च ते महित्वम् ॥२.१.२००॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् [10.14.11] से एक उदाहरण: "मैं क्या हूँ, अपने ही हाथ के सात बित्ते जितना छोटा प्राणी? मैं एक बर्तन जैसे ब्रह्मांड में घिरा हुआ हूँ, जो भौतिक प्रकृति, समग्र भौतिक ऊर्जा, मिथ्या अहंकार, आकाश, वायु, जल और पृथ्वी से बना है। और आपकी महिमा क्या है? आपके शरीर के रोमछिद्रों से अनंत ब्रह्मांड गुजरते हैं, जैसे धूल के कण किसी जालीदार खिड़की के छिद्रों से गुजरते हैं।"
 
An example from Srimad Bhagavatam [10.14.11]: "What am I, a creature as small as seven spans of my own hand? I am enclosed in a vessel-like universe, which is made up of material nature, the entire material energy, false ego, sky, air, water and earth. And what is Your glory? Infinite universes pass through the pores of Your body, just as dust particles pass through the pores of a latticed window."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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