श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 199
 
 
श्लोक  2.1.199 
(५७) कोटि-ब्रह्माण्ड-विग्रहः: हविन्ग् अ fओर्म् ओf तेन् मिल्लिओन् उनिवेर्सेस् —
अगण्य-जगद्-अण्डाढ्यः कोटि-ब्रह्माण्ड-विग्रहः ।
इति श्री-विग्रहस्यास्य विभुत्वम् अनुकीर्तितम् ॥२.१.१९९॥॥
 
 
अनुवाद
"जिसका स्वरूप अनंत ब्रह्माण्डों से युक्त है, उसे 'करोड़ ब्रह्माण्डों का रूप' कहा जाता है। इस प्रकार उसके स्वरूप की महानता का गुणगान होता है।"
 
"He whose form consists of infinite universes is called 'the form of millions of universes'. Thus the greatness of his form is praised."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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