श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  2.1.193 
यथा —
दशभिः सिद्ध-सखीभिर् वृता महा-सिद्धयः क्रमाद् अष्टौ ।
अणिमादयो लभन्ते नावसरं द्वारि कृष्णस्य ॥२.१.१९३॥
 
 
अनुवाद
"दस सहचर सिद्धियों द्वारा सेवित आठ महान सिद्धियों को कृष्ण के महल के द्वार में प्रवेश करने का अवसर भी नहीं मिलता।"
 
"The eight great Siddhis served by the ten companion Siddhis do not even get the opportunity to enter the gates of Krishna's palace."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)