श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  2.1.186 
यथा वा ललित-माधवे (१.५२) —
कुलवर-तनु-धर्म-ग्राव-वृन्दानि भिन्दन्
सुमुखि निशित-दीर्घापाङ्ग-टङ्क-च्छटाभिः ।
युगपद् अयम् अपूर्वः कः पुरो विश्व-कर्मा
मरकत-मणि-लक्षैर् गोष्ठ-कक्षां चिनोति ॥२.१.१८६॥
 
 
अनुवाद
ललितामाधव का एक और उदाहरण: "हे सुन्दर मुख वाले मित्र! यह श्रेष्ठ शिल्पी विश्वकर्मा कौन है जो हमारे सामने खड़ा है, अपनी लंबी, तीक्ष्ण, छेनी-जैसी आँखों की कोरों से समस्त युवतियों के संयम के पत्थरों को तोड़ रहा है और साथ ही लाखों नीलमणियों से गौशाला का निर्माण कर रहा है?"
 
Another example from Lalitamadhava: "O beautiful-faced friend! Who is this great architect Vishwakarma standing before us, breaking the stones of restraint of all the maidens with the corners of his long, sharp, chisel-like eyes and at the same time building a cowshed with millions of sapphires?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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