श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  2.1.175 
यथा —
ब्रह्मन्न् अत्र पुरु-द्विषा सह पुरः पीठे निषीद क्षणं
तुष्णीं तिष्ठ सुरेन्द्र चाटुभिर् अलं वारीश दूरीभव ।
एते द्वारि मुहुः कथं सुर-गणाः कुर्वन्ति कोलाहलं
हन्त द्वारवती-पतेर् अवसरो नाद्यापि निष्पद्यते ॥२.१.१७५॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा आदि कृष्ण से मिलने द्वारका के द्वार पर पहुँचे। द्वारपाल ने कहा: 'हे ब्रह्मा! इस आसन पर शिवजी के साथ एक क्षण के लिए बैठिए। स्तुति-गान करने की आवश्यकता नहीं है। बस मौन रहिए। हे वरुण! चले जाइए। देवता द्वार पर इतना शोर क्यों मचा रहे हैं? द्वारकाधीश के आने का अभी समय नहीं है।'"
 
Brahma and others arrived at the gates of Dwaraka to meet Krishna. The gatekeeper said: "O Brahma! Please sit on this seat with Lord Shiva for a moment. There is no need to sing hymns. Just remain silent. O Varuna, please go away. Why are the gods making so much noise at the gate? It is not yet time for Dwarakadish to arrive."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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