श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  2.1.173 
यथा वा कृष्ण-कर्णामृते —
चिन्तामणिश् चरण-भूषणम् अङ्गनानां
शृङ्गार-पुष्प-तरवस् तरवः सुराणाम् ।
वृन्दावने व्रज-धनं ननु काम-धेनु-
वृन्दानि चेति सुख-सिन्धुर् अहो विभूतिः ॥२.१.१७३॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण-कर्णामृत से एक और उदाहरण: "व्रजभूमि की युवतियों के नूपुर चिंतामणि पत्थर से बने हैं। ये वृक्ष मनोकामनाओं को पूरा करने वाले हैं, और इनमें फूल लगते हैं जिनसे गोपियाँ अपना श्रृंगार करती हैं। यहाँ मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गायें [कामधेनु] भी हैं, जो असीमित मात्रा में दूध देती हैं। ये गायें वृंदावन की संपदा हैं। इस प्रकार वृंदावन का ऐश्वर्य आनंदपूर्वक प्रदर्शित होता है।"
 
Another example from the Krishna-Karnāmṛta: "The anklets of the maidens of Vrajabhumi are made of Chintamani stone. These trees are wish-fulfilling, and they bear flowers with which the gopis adorn themselves. There are also wish-fulfilling cows [Kamadhenu] here, which give unlimited milk. These cows are the wealth of Vrindavan. Thus the opulence of Vrindavan is joyfully displayed."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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