श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.1.172 
यथा —
षट्-पञ्चाशद्-यदु-कुल-भुवां कोटयस् त्वां भजन्ते
वर्षन्त्य् अष्टौ किम् अपि निधयश् चार्थ-जातं तवामी ।
शुद्धान्तश् च स्फुरति नवभिर् लक्षितः सौध-लक्ष्मैर्
लक्ष्मीं पश्यन् मुर-दमन ते नात्र चित्रायते कः ॥२.१.१७२॥
 
 
अनुवाद
"हे मुर को वशीभूत करने वाले! 560,000,000 यदु आपकी सेवा कर रहे हैं। आपकी आठ निधियाँ समस्त धन की वर्षा कर रही हैं। 900,000 पवित्र महल वैभव से जगमगा रहे हैं। आपकी सम्पदा देखकर कौन आश्चर्यचकित न होगा?"
 
"O vanquisher of Mura! 560,000,000 Yadus are serving you. Your eight treasures are showering all kinds of wealth. 900,000 sacred palaces are resplendent with splendor. Who would not be amazed by your wealth?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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