श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  2.1.169 
(४७) सर्वाराध्यः —
सर्वेषाम् अग्र-पूज्यो यः स सर्वाराध्य उच्यते ॥२.१.१६९॥॥
 
 
अनुवाद
(47) सर्वाध्याय: सर्वपूज्य - "जिसकी पूजा सबसे पहले की जानी चाहिए, वह सर्वपूज्य कहलाता है।"
 
(47) Sarvadhyaya: Sarvapujya - "He who should be worshipped first is called Sarvapujya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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