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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
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श्लोक 164
श्लोक
2.1.164
(४५) साधु-समाश्रयः —
सद्-एक-पक्षपाती यः स स्यात् साधु-समाश्रयः ॥२.१.१६४॥॥
अनुवाद
(45) साधु-समाश्रय: भक्तों की रक्षा करता है - "जो भक्तों के प्रति अनन्य भाव रखता है, वह भक्तों का रक्षक कहलाता है।"
(45) Sadhu-samasraya: Protector of devotees – “He who has exclusive devotion for the devotees is called the protector of the devotees.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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