श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  2.1.163 
यथा वा —
आशीस्-तथ्या जय जय जयेत्य् आविरास्ते मुनीनां
देव-श्रेणी-स्तुति-कल-कलो मेदुरः प्रादुरस्ति ।
हर्षाद् घोषः स्फुरति परितो नागरीणां गरीयान्
के वा रङ्ग-स्थल-भुवि हरौ भेजिरे नानुरागम् ॥२.१.१६३॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "जब कृष्ण कंस के अखाड़े में आए, तो ऋषियों ने 'विजय! विजय! विजय!' के आशीर्वाद दिए। देवताओं ने मधुर स्तुति-गीत गाए। हर्ष से चारों ओर स्त्रियाँ ज़ोर-ज़ोर से जयकारे लगाने लगीं। क्रीड़ास्थल पर कृष्ण के प्रति किसका आकर्षण नहीं हुआ?"
 
Another example: "When Krishna entered Kansa's arena, the sages blessed him with cries of 'Victory! Victory! Victory!' The gods sang sweet songs of praise. The women all around cheered loudly with joy. Who on the field of play was not attracted to Krishna?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)