तद् उक्तम् अग्नि-पुराणे —
विभाव्यते हि रत्य्-आदिर् यत्र येन विभाव्यते ।
विभावो नाम स द्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः ॥२.१.१५॥
अनुवाद
अग्नि पुराण [अलंकार खंड, 3.35] में इसका उल्लेख है: "विभाव दो प्रकार के आलम्बन को संदर्भित करता है - वह व्यक्ति जिसके संबंध में रति और अन्य तत्वों का अनुभव किया जाता है (विषय), वह व्यक्ति जिसमें रति और अन्य तत्वों का अनुभव किया जाता है (आश्रय) - और उद्दीपन, वह उत्तेजना जिसके द्वारा रति का अनुभव किया जाता है।"
The Agni Purana [Alankara Khanda, 3.35] mentions this: "Vibhava refers to two kinds of alambana – the person in relation to whom Rati and other elements are experienced (vishya), the person in whom Rati and other elements are experienced (ashraya) – and uddipana, the stimulus by which Rati is experienced."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥