श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 149
 
 
श्लोक  2.1.149 
तत्र आद्यो, यथा विष्णु-धर्मे —
तुलसी-दल-मात्रेण जलस्य चुलुकेन च ।
विक्रीणीते स्वम् आत्मानं भक्तेभ्यो भक्त-वत्सलः ॥२.१.१४९॥
 
 
अनुवाद
विष्णु धर्म से, सहज सेवा का एक उदाहरण: "यदि भक्त भगवान को केवल जल और तुलसी के पत्ते अर्पित करते हैं, तो भगवान, भक्तों के प्रति स्नेही होने के कारण, स्वयं को भक्तों के नियंत्रण में रखते हैं।"
 
From Vishnu Dharma, an example of Sahaja Seva: "If devotees offer only water and Tulsi leaves to the Lord, the Lord, being affectionate towards the devotees, puts Himself under the control of the devotees."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)