श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.1.145 
(३८) सुखी —
भोक्ता च दुःख-गन्धैर् अप्य् अस्पृष्टश् च सुखी भवेत् ॥२.१.१४५॥॥
 
 
अनुवाद
(38) सुखी: सुखी - "जो व्यक्ति भोगी है और जिसे दुःख का लेशमात्र भी स्पर्श नहीं होता, उसे सुखी व्यक्ति कहते हैं।"
 
(38) Sukhi: Sukhi - "A person who is a pleasure-seeker and is not touched by even a trace of sorrow is called a happy person."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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