श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.1.14 
तत्र विभावाः —
तत्र ज्ञेया विभावास् तु रत्य्-आस्वादन-हेतवः ।
ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपनाः परे ॥२.१.१४॥
 
 
अनुवाद
"रस में विभावों को रति के आस्वादन का कारण जानना चाहिए। वे दो प्रकार के आधार (आलंबन) और उद्दीपन (उद्दीपन) का रूप धारण करते हैं।"
 
"The vibhavas in rasa should be understood as the cause of the enjoyment of love. They take the form of two types: base (alambana) and stimulus (uddipana)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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