श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 139
 
 
श्लोक  2.1.139 
(३५) विनयी —
औद्धत्य-परिहारी यः कथ्यते विनयीत्य् असौ ॥२.१.१३९॥॥
 
 
अनुवाद
(35) विनयी: विनयशील - "जो व्यक्ति अहंकार से रहित है, उसे विनयशील कहा जाता है।"
 
(35) Vinayi: Vinaysheel - "A person who is free from ego is called Vinaysheel."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)