श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 131
 
 
श्लोक  2.1.131 
द्वितीयो, यथा —
क्षणाद् अक्षौहिणी-वृन्दे जरासन्धस्य दारुणे ।
दृष्टः को’प्य् अत्र नादष्टो हरेः प्रहरणाहिभिः ॥२.१.१३१॥
 
 
अनुवाद
शस्त्र चलाने में निपुण होने का एक उदाहरण: "पल भर में ही जरासंध की अक्षौहिणी सेना के भयंकर दल में कोई भी ऐसा सैनिक नहीं दिखाई देता था, जिसे भगवान के सर्प-बाणों ने न काटा हो।"
 
An example of mastery of weaponry: "In a moment, not a single soldier was to be seen in the fierce army of Jarasandha's Akshohini army who had not been stung by the Lord's serpent-like arrows."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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