श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.1.127 
यथा —
पादैश् चतुर्भिर् भवता वृषस्य
गुप्तस्य गोपेन्द्र तथाभ्यवर्धि ।
स्वैरं चरन्न् एव यथा त्रिलोक्याम्
अधर्म-स्पर्शाणि हठाज् जघास ॥२.१.१२७॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण : "हे ग्वालराज! आपके संरक्षण में धर्मरूपी चार पैरों वाला बैल इतना फल-फूल गया है कि तीनों लोकों में सर्वत्र जाकर उसने अधर्मरूपी घास को बलपूर्वक खा लिया है।"
 
Example: "O King of Cows! Under your protection, the four-legged bull representing Dharma has flourished so much that it has gone everywhere in the three worlds and has forcefully eaten the grass representing Adharma."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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