श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  2.1.117 
(२७) धृतिमान् —
पूर्ण-स्पृहश् च धृतिमान् शान्तश् च क्षोभ-कारणे ॥२.१.११७॥॥
 
 
अनुवाद
(27) धृतिमान्: दृढ़ - "जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं में पूर्णतया संतुष्ट है, अथवा जो अपने मन को वश में करके व्याकुलता का कारण आने पर भी शांत रहता है, वह दृढ़ कहलाता है।"
 
(27) Dhritiman: Firm - "He who is completely satisfied with his desires, or who controls his mind and remains calm even when there is cause for anxiety, is called firm."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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