श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  2.1.116 
यथा वा —
उन्मदो’पि हरिर् नव्य-राधा-प्रणय-सीधुना ।
अभिज्ञेनापि रामेण लक्षितो’यम् अविक्रियः ॥२.१.११६॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "यद्यपि कृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाते समय राधा के प्रेम की नवीन मदिरा से मतवाले थे, फिर भी सर्वज्ञ बलराम भी परिवर्तन का कोई संकेत नहीं देख सके।"
 
Another example: "Although Krishna was intoxicated with the new wine of Radha's love when he lifted the Govardhan mountain, even the omniscient Balarama could not see any sign of change."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)