श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 4: प्रेम-भक्ति (भगवान के प्रेम में भक्ति)  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.4.17 
धन्यस्यायं नवः प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।
अन्तर्वाणीभिर् अप्य् अस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा ॥१.४.१७॥
 
 
अनुवाद
"यह नित्य नवीन प्रेम उस व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न होता है जो अत्यंत भाग्यशाली होता है। उस व्यक्ति का आचरण शास्त्रों के जानकारों के लिए भी समझना बहुत कठिन होता है।"
 
"This ever-new love arises in the heart of a person who is extremely fortunate. The conduct of that person is very difficult to understand even for those who are knowledgeable in the scriptures."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)