श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.3.59 
जने चेज् जात-भावे’पि वैगुण्यम् इव दृश्यते ।
कार्या तथापि नासूया कृतार्थः सर्वथैव सः ॥१.३.५९ ॥
 
 
अनुवाद
“यदि किसी ऐसे व्यक्ति में कोई स्पष्ट दोष दिखाई दे, जिसने वास्तविक भाव विकसित कर लिया है, तो उसके प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसने सभी प्रकार से लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।”
 
“If any obvious fault is seen in a person who has developed real feelings, one should not be hostile towards him, because he has achieved the goal in every way.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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