श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  1.3.47-48 
दैवात् सद्-भक्त-सङ्गेन कीर्तनाद्य्-अनुसारिणाम् ।
प्रायः प्रसन्न-मनसां भोग-मोक्षादि रागिणाम् ॥१.३.४७॥
केषांचित् हृदि भावेन्दोः प्रतिबिम्ब उदञ्चति ।
तद्-भक्त-हृन्-नभः-स्थस्य तत्-संसर्ग-प्रभावतः ॥१.३.४८॥
 
 
अनुवाद
"भावचंद्र का प्रतिबिंब कुछ ऐसे व्यक्तियों के हृदय में प्रकट होता है जो भोग या मोक्ष में आसक्त रहते हैं, किन्तु जो कभी-कभार सच्चे भक्तों की संगति से भक्ति के अंगों का पालन करके कुछ हद तक संतुष्ट हो जाते हैं। वह भावचंद्र सच्चे भक्त के हृदय रूपी आकाश में स्थित होता है, और अपने संस्कारों द्वारा कुछ समय के लिए अभक्त में प्रतिबिंब के रूप में प्रकट होता है।"
 
"The reflection of Bhavacandra appears in the hearts of some persons who are attached to enjoyment or liberation, but who, through the association of true devotees, are occasionally satisfied to some extent by observing the limbs of devotion. That Bhavacandra is situated in the sky of the heart of the true devotee, and by its impressions, for a time, appears as a reflection in the non-devotee."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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