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श्लोक 1.3.44-45  |
किन्तु बाल-चमत्कार-करी तच्-चिह्न-वीक्षया ।
अभिज्ञेन सुबोधो’यं रत्य्-आभासः प्रकीर्तितः ॥१.३.४४ ॥
प्रतिबिम्बस् तथा च्छाया रत्य्-आभासो द्विधा मतः ॥१.३.४५॥ |
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| अनुवाद |
| "यद्यपि रति का यह आभास भोले-भाले लोगों को बहुत आश्चर्यजनक लगता है, किन्तु ज्ञानी लोग [तथाकथित रति प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति के] गुणों को देखकर समझ जाते हैं कि यह वास्तव में क्या है। इसे रतिभास, अर्थात् रति का आभास कहते हैं। रति के इस आभास के दो प्रकार हैं: प्रतिबिम्ब और छाया।" |
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| "Although this appearance of love seems very surprising to the naive, wise people, by observing the qualities [of the person displaying so-called love], understand what it really is. This is called Ratibhasa, the appearance of love. This appearance of love has two types: reflection and shadow." |
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