श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  1.3.44-45 
किन्तु बाल-चमत्कार-करी तच्-चिह्न-वीक्षया ।
अभिज्ञेन सुबोधो’यं रत्य्-आभासः प्रकीर्तितः ॥१.३.४४ ॥
प्रतिबिम्बस् तथा च्छाया रत्य्-आभासो द्विधा मतः ॥१.३.४५॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि रति का यह आभास भोले-भाले लोगों को बहुत आश्चर्यजनक लगता है, किन्तु ज्ञानी लोग [तथाकथित रति प्रदर्शित करने वाले व्यक्ति के] गुणों को देखकर समझ जाते हैं कि यह वास्तव में क्या है। इसे रतिभास, अर्थात् रति का आभास कहते हैं। रति के इस आभास के दो प्रकार हैं: प्रतिबिम्ब और छाया।"
 
"Although this appearance of love seems very surprising to the naive, wise people, by observing the qualities [of the person displaying so-called love], understand what it really is. This is called Ratibhasa, the appearance of love. This appearance of love has two types: reflection and shadow."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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