श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 3: भाव-भक्ति (उत्कट समाधि में भक्ति)  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.3.22 
नारदस्य प्रसादेन प्रह्लादे शुध-वासना ।
निसर्गः सैव तेनात्र रतिर् नैसर्गिकी मता ॥१.३.२२ ॥
 
 
अनुवाद
"नारद ने प्रह्लाद पर कृपा या निसर्ग किया और इससे उनमें भक्ति भावनाएँ उत्पन्न हुईं। इसलिए उनकी रति को नैसर्गिकी (दया द्वारा) कहा जाता है।"
 
"Narada showered Prahlada with grace or nirgha and this aroused devotional feelings in him. Hence his love is called nirgha (by kindness)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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