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श्लोक 1.2.37  |
अष्टमे श्री-गजेन्द्रोक्तौ (८.३.२०) —
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्-प्रपन्नाः ।
अत्य्-अद्भुतं तच्-चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्द-समुद्र-मग्नाः ॥१.२.३७॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीमद्भागवतम् के आठवें स्कंध [8.3.20] में गजेन्द्र कहते हैं: "निष्काम भक्त, जिनकी भगवान की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं है, पूर्ण समर्पण भाव से उनकी पूजा करते हैं और सदैव उनके अत्यंत अद्भुत एवं मंगलमय कार्यों का श्रवण एवं कीर्तन करते हैं। इस प्रकार वे सदैव दिव्य आनंद के सागर में लीन रहते हैं।" |
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| In the Eighth Canto of Srimad Bhagavatam [8.3.20], Gajendra says: "The selfless devotees, who have no other desire than to serve the Lord, worship Him with complete surrender and always hear and sing about His most wonderful and auspicious deeds. Thus they always remain absorbed in the ocean of transcendental bliss." |
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