श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.2.32 
षष्ठे श्री-वृत्रोक्तौ (६.११.२५) —
न नाक-पृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं
न सार्व-भौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योग-सिद्धीर् अपुनर्-भवं वा
समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे ॥१.२.३२॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के छठे स्कंध [6.11.25] में वृत्र कहते हैं: "हे मेरे प्रभु, समस्त अवसरों के स्रोत, मैं ध्रुवलोक, स्वर्गलोक या ब्रह्माजी के निवास स्थान में भोग-विलास की इच्छा नहीं रखता, न ही मैं समस्त पार्थिव लोकों या निम्न लोकों का अधिपति बनना चाहता हूँ। मैं योगशक्ति का स्वामी नहीं बनना चाहता, न ही मैं आपके चरणकमलों का त्याग करके मोक्ष चाहता हूँ।"
 
In the sixth canto [6.11.25] of the Srimad Bhagavatam, Vritra says: "O my Lord, the source of all opportunities, I do not desire the pleasures of Dhruvaloka, the heavenly planet, or the abode of Lord Brahma, nor do I desire to become the ruler of all the terrestrial planets or the lower planets. I do not desire to become the master of yogic power, nor do I desire liberation by abandoning Your lotus feet."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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