|
| |
| |
श्लोक 1.2.309  |
कृष्ण-तद्-भक्त-कारुण्य-मात्र-लाभैक-हेतुका ।
पुष्टि-मार्गतया कैश्चिद् इयं रागानुगोच्यते ॥१.२.३०९ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| "कृष्ण और उनके भक्तों की कृपा ही रागानुग भक्ति प्राप्त करने का एकमात्र कारण है। कुछ लोग इस प्रकार की भक्ति को पुष्टिमार्ग कहते हैं।" |
| |
| "The grace of Krishna and his devotees is the only reason for attaining raganuga bhakti. Some people call this type of devotion Pushtimarg." |
| |
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धौ
पुर्व-विभागे साधन-भक्ति-लहरी-द्वितिया ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के पूर्वी महासागर में 'साधना-भक्ति' से संबंधित दूसरी लहर समाप्त होती है।" |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|