श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 299
 
 
श्लोक  1.2.299 
केलि-तात्पर्यवत्य् एव सम्भोगेच्छा-मयी भवेत् ।
तद्-भावेच्छात्मिका तासाम् भाव-माधुर्य-कामिता ॥१.२.२९९ ॥
 
 
अनुवाद
"संभोगेच्छामयी भक्ति कृष्ण के साथ दाम्पत्य सुख का आनंद लेने से होती है। तद्भावेच्छात्मा भक्ति कामरूपसिद्ध भक्तों के मधुर प्रेम भाव की अभिलाषा करने से होती है।"
 
"Sambhogechchamayi bhakti is by enjoying conjugal happiness with Krishna. Tadbhavechchaatma bhakti is by desiring the sweet love feelings of the devotees who are emancipated from Kamarupa."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)