श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 292
 
 
श्लोक  1.2.292 
तत्-तद्-भावादि-माधुर्ये श्रुते धीर् यद् अपेक्षते ।
नात्र शास्त्रं न युक्तिं च तल्-लोभोत्पत्ति-लक्षणं ॥१.२.२९२ ॥
 
 
अनुवाद
"उस लोभ का आविर्भाव तब होता है जब बुद्धि शास्त्र और तर्क के नियमों पर निर्भर नहीं रहती, शास्त्रों के श्रवण के माध्यम से व्रजवासियों के प्रेम की मधुरता को कुछ हद तक अनुभव करने के बाद।"
 
"That greed arises when the intellect no longer depends on the rules of scriptures and logic, after experiencing to some extent the sweetness of the love of the Vrajavasis through hearing the scriptures."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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