| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार » लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति) » श्लोक 289 |
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| | | | श्लोक 1.2.289  | काम-सम्बन्ध-रूपे ते प्रेम-मात्र-स्वरूपके ।
नित्य-सिद्धाश्रयतया नात्र सम्यग् विचारिते ॥१.२.२८९ ॥ | | | | | | अनुवाद | | “चूँकि कामरूप भक्ति और सम्बन्धरूप भक्ति, जो केवल प्रेम से उत्पन्न होती हैं, नित्यसिद्धों का आश्रय लेती हैं, अतः इस खण्ड में उन पर विस्तृत चर्चा नहीं की गई है।” | | | | “Since Kamarupa Bhakti and Sambandharupa Bhakti, which arise only from love, take shelter of the Nityasiddhas, they are not discussed in detail in this section.” | | ✨ ai-generated | | |
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