श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 289
 
 
श्लोक  1.2.289 
काम-सम्बन्ध-रूपे ते प्रेम-मात्र-स्वरूपके ।
नित्य-सिद्धाश्रयतया नात्र सम्यग् विचारिते ॥१.२.२८९ ॥
 
 
अनुवाद
“चूँकि कामरूप भक्ति और सम्बन्धरूप भक्ति, जो केवल प्रेम से उत्पन्न होती हैं, नित्यसिद्धों का आश्रय लेती हैं, अतः इस खण्ड में उन पर विस्तृत चर्चा नहीं की गई है।”
 
“Since Kamarupa Bhakti and Sambandharupa Bhakti, which arise only from love, take shelter of the Nityasiddhas, they are not discussed in detail in this section.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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