| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार » लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति) » श्लोक 279 |
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| | | | श्लोक 1.2.279  | ब्रह्मण्य् एव लयं यान्ति प्रायेण रिपवो हरेः ।
केचित् प्राप्यापि सारूप्याभासं मज्जन्ति तत्-सुखे ॥१.२.२७९ ॥ | | | | | | अनुवाद | | "भगवान के शत्रु प्रायः निराकार ब्रह्म में ही विलीन हो जाते हैं। उनमें से कुछ, भले ही वे भगवान के समान स्वरूप (सारूप्यभासम्) प्राप्त कर लेते हैं, ब्रह्म के आनंद में लीन रहते हैं।" | | | | "The enemies of the Lord often merge into the formless Brahman. Some of them, even if they attain the same form (sarupyabhasam) as the Lord, remain absorbed in the bliss of Brahman." | | ✨ ai-generated | | |
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