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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार
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लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)
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श्लोक 272
श्लोक
1.2.272
इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत् ।
तन्-मयी या भवेद् भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥१.२.२७२ ॥
अनुवाद
"राग को प्रेम की वस्तु के प्रति सहज, गहन प्यास के रूप में परिभाषित किया गया है। ऐसी प्यास से प्रेरित भक्ति को रागात्मक-भक्ति कहते हैं।"
"Raga is defined as an innate, intense thirst for the object of love. Devotion inspired by such thirst is called raga-tmak-bhakti."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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