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श्लोक 1.2.272  |
इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत् ।
तन्-मयी या भवेद् भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥१.२.२७२ ॥ |
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| अनुवाद |
| "राग को प्रेम की वस्तु के प्रति सहज, गहन प्यास के रूप में परिभाषित किया गया है। ऐसी प्यास से प्रेरित भक्ति को रागात्मक-भक्ति कहते हैं।" |
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| "Raga is defined as an innate, intense thirst for the object of love. Devotion inspired by such thirst is called raga-tmak-bhakti." |
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