धन-शिष्यादिभिर् द्वारैर् या भक्तिर् उपपाद्यते ।
विदूरत्वाद् उत्तमता-हान्या तस्याश् च नाङ्गता ॥१.२.२५९ ॥
अनुवाद
"जो भक्ति धन, अनुयायियों या अन्य वस्तुओं पर निर्भर होकर प्राप्त की जाती है, उसे उत्तम-भक्ति का अंग नहीं माना जा सकता क्योंकि वह उत्तम-भक्ति के शुद्ध स्वरूप को नष्ट कर देती है। वह उत्तम-भक्ति से बहुत दूर स्थित है।"
"The devotion that is obtained by relying on money, followers, or other things cannot be considered a part of the best devotion because it destroys the pure form of the best devotion. It is far removed from the best devotion."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥