श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 250
 
 
श्लोक  1.2.250 
यथा तत्रैव (११.२०.३१) —
तस्मान् मद्-भक्ति-युक्तस्य योगिनो वै मद्-आत्मनः ।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेद् इह ॥१.२.२५०॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवत [11.20.31] में भी कहा गया है: “अतः, जो भक्त मेरी प्रेममयी सेवा में लगा हुआ है और जिसका मन मुझमें स्थिर है, उसके लिए ज्ञान और वैराग्य का अनुशीलन सामान्यतः इस संसार में सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का साधन नहीं है।”
 
It is also said in Srimad Bhagavatam [11.20.31]: “Therefore, for the devotee who is engaged in My loving service and whose mind is fixed on Me, the cultivation of knowledge and detachment is not generally the means to attain the highest perfection in this world.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)