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श्लोक 1.2.238  |
दुरूहाद्भुत-वीर्ये’स्मिन् श्रद्धा दूरे’स्तु पञ्चके ।
यत्र स्वल्पो’पि सम्बन्धः सद्-धियां भाव-जन्मने॥१.२.२३८॥ |
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| अनुवाद |
| "अंतिम पाँच वस्तुओं में अकल्पनीय और अद्भुत शक्ति है। इन वस्तुओं में श्रद्धा की तो बात ही क्या, इनके साथ थोड़ा-सा भी संबंध रखने पर अपराध-रहित व्यक्ति भाव की प्राप्ति कर सकते हैं।" |
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| "The last five objects possess unimaginable and wondrous power. Not to mention faith in these objects, even the slightest connection with them can bring guiltless individuals the ultimate goal." |
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