श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 238
 
 
श्लोक  1.2.238 
दुरूहाद्भुत-वीर्ये’स्मिन् श्रद्धा दूरे’स्तु पञ्चके ।
यत्र स्वल्पो’पि सम्बन्धः सद्-धियां भाव-जन्मने॥१.२.२३८॥
 
 
अनुवाद
"अंतिम पाँच वस्तुओं में अकल्पनीय और अद्भुत शक्ति है। इन वस्तुओं में श्रद्धा की तो बात ही क्या, इनके साथ थोड़ा-सा भी संबंध रखने पर अपराध-रहित व्यक्ति भाव की प्राप्ति कर सकते हैं।"
 
"The last five objects possess unimaginable and wondrous power. Not to mention faith in these objects, even the slightest connection with them can bring guiltless individuals the ultimate goal."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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