श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 226
 
 
श्लोक  1.2.226 
मुहुर् अहो रसिका भुवि भावुकाः ॥१.२.२२६॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कन्ध [1.1.3] से: "हे विद्वान एवं विचारशील पुरुषों, वैदिक साहित्य रूपी कल्पवृक्ष के परिपक्व फल श्रीमद्भागवतम् का आस्वादन करो। यह श्रीशुकदेव गोस्वामी के मुख से निकला है। इसलिए यह फल और भी अधिक स्वादिष्ट हो गया है, हालाँकि इसका अमृतमय रस पहले से ही मुक्तात्माओं सहित सभी के लिए स्वादिष्ट था।"
 
From the first canto [1.1.3] of the Srimad Bhagavatam: "O learned and thoughtful ones, taste the Srimad Bhagavatam, the ripe fruit of the Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) of Vedic literature. It has come from the mouth of Sri Sukadeva Gosvami. Therefore, this fruit has become even more delicious, although its nectar-like juice was already delicious for all, including the liberated souls."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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