श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.2.18 
तत्र मध्यमः —
यः शास्त्रादिष्व् अनिपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः ॥१.२.१८॥
 
 
अनुवाद
“मध्यमाधिकारी की परिभाषा इस प्रकार है: वह व्यक्ति जो उत्तमाधिकारी की तरह शास्त्रों से पूर्णतः परिचित नहीं है, किन्तु उनमें दृढ़ विश्वास रखता है, उसे मध्यमाधिकारी कहा जाता है।”
 
“The definition of Madhyamadhikari is as follows: A person who is not fully acquainted with the scriptures like the Uttamadhikari, but has strong faith in them, is called Madhyamadhikari.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)