श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 166
 
 
श्लोक  1.2.166 
४१ - अथ श्री-मूर्तेर् दर्शनम्, यथा वाराहे —
वृन्दावने तु गोविन्दं ये पश्यन्ति वसुन्धरे ।
न ते यम-पुरं यान्ति यान्ति पुण्य-कृतां गतिम् ॥१.२.१६६॥
 
 
अनुवाद
वराह पुराण में विग्रह को देखकर कहा गया है: "हे पृथ्वी! जो लोग वृन्दावन में गोविन्द को देखते हैं, वे यम की नगरी में नहीं जाते, अपितु उन्हें शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है, जो सभी पुण्यों का लक्ष्य है।"
 
In the Varaha Purana, looking at the Deity, it is said: "O Earth! Those who see Govinda in Vrindavana do not go to the city of Yama, but attain pure devotion, which is the goal of all virtues."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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