दैन्य-बोधिका, यथा तत्रैव —
मत्-तुल्यो नास्ति पापात्मा नापराधी च कश्चन ।
परिहारे’पि लज्जा मे किं ब्रूवे पुरुषोत्तम ॥१.२.१५४ ॥
अनुवाद
पद्म पुराण में व्यर्थता की स्वीकृति दर्शाई गई है: "हे परमेश्वर! मुझ जैसा पापी कोई नहीं है, न ही किसी ने इतने अपराध किए हैं। मैं क्या कहूँ? मुझे आपसे इन पापों को दूर करने की प्रार्थना करते हुए बहुत शर्म आ रही है।"
The Padma Purana depicts the acceptance of futility: "O Lord! There is no one as sinful as I, nor has anyone committed so many crimes. What should I say? I feel very ashamed to pray to You to remove these sins."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)