श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 1: पूर्वी विभाग: भक्ति के विभिन्न प्रकार  »  लहर 2: साधना-भक्ति (अभ्यास में भक्ति)  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.2.117 
१८- भूतानुद्वेग-दायिता, यथा महाभारते —
पितेव पुत्रं करुणो नोद्वेजयति यो जनम् ।
विशुद्धस्य हृषीकेशस् तूर्णं तस्य प्रसीदति ॥१.२.११७॥
 
 
अनुवाद
अन्य जीवों को पीड़ा न पहुँचाना, महाभारत से: "वह शुद्ध व्यक्ति जो दूसरों को पीड़ा नहीं पहुँचाता, अपने पुत्र के प्रति पिता की तरह दयालु होता है, वह इंद्रियों के स्वामी को शीघ्र ही प्रसन्न कर लेता है।"
 
Not causing pain to other living beings, from the Mahabharata: "The pure person who does not cause pain to others, is kind like a father to his son, quickly pleases the lord of the senses."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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