तं त्वामहं ज्ञानघनं स्वभाव-
प्रध्वस्तमायागुणभेदमोहै: ।
सनन्दनाद्यैर्मुनिभिर्विभाव्यं
कथं विमूढ: परिभावयामि ॥ २३ ॥
अनुवाद
हे प्रभु, प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त हुए साधुपुरुष, यथा चारों कुमार (सनत्, सनक, सनन्दन तथा सनातन) ही ज्ञान के पुंज आपके विषय में सोच सकते हैं। पर मैं ऐसा अज्ञानी हूँ कि आपके विषय में क्या सोच सकता हूँ?
O Lord, only the saints who are free from the influence of the three modes of nature, like the four Kumaras (Sanat, Sanaka, Sanandana and Sanatana) who are the embodiments of knowledge, can think about you. How can an ignorant person like me think about you?
तात्पर्य
स्वभाव शब्द स्वयं की आध्यात्मिक प्रकृति या आध्यात्मिक संवैधानिक स्थिति को दर्शाता है। जब कोई इस मूल स्थिति में रहता है, तो जीवभूत भौतिक प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहता है। सगुणान् समतीत्यैतान ब्रह्मभूयाय कल्पते (भ.गी. 14.26)। जैसे ही कोई भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, वह ब्रह्म मंच पर स्थित हो जाता है। इस प्रकार स्थित व्यक्तियों के विशद उदाहरण चार कुमार और नारद हैं। ऐसे अधिकारी स्वाभाविक रूप से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की स्थिति को समझ सकते हैं, लेकिन भौतिक प्रकृति के प्रभाव से मुक्त नहीं हुई एक शर्तबद्ध आत्मा सर्वोच्च को महसूस करने में असमर्थ है। इसलिए, भगवद-गीता (2.45) में, कृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं, त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुनः: व्यक्ति को भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठना चाहिए। जो व्यक्ति तीन भौतिक प्रकारों के प्रभाव में रहता है, वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझने में असमर्थ होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥