श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  9.8.21 
अंशुमानुवाच
न पश्यति त्वां परमात्मनोऽजनो
न बुध्यतेऽद्यापि समाधियुक्तिभि: ।
कुतोऽपरे तस्य मन:शरीरधी-
विसर्गसृष्टा वयमप्रकाशा: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
अंशुमान ने कहा: हे भगवान, आपके बेहद ऊँचे पद को, जिसे ध्यान या विचार से समझ पाना असंभव है, ब्रह्मा जी आज तक समझ नहीं पाए हैं। तो फिर हम जैसे लोगों की क्या बात करना, जिन्हें ब्रह्मा ने कई रूपों में बनाया है, जैसे देवताओं, पशुओं, मनुष्यों, पक्षियों और जानवरों के रूप में? हम पूरी तरह से अज्ञानता में हैं। इसलिए, हम आपको, जो परम ब्रह्म हैं, कैसे जान सकते हैं?
 
Anshuman said: O Lord, even Brahmaji is unable to understand your inaccessible position through meditation or contemplation, then what about people like us who have been created by Brahma in various forms of gods, animals, humans, birds and animals etc.? We are completely ignorant. Therefore, how can we know you as the Brahma himself?
तात्पर्य
इच्छा-द्वेष-समुत्थेन

द्वंद्व-मोहेन भारत

सर्व-भूतानि संमोहम्

सर्गे यान्ति परंतपा

"हे भारत [अर्जुन] के वंशज और शत्रु विजयी, सभी जीव भ्रम में पैदा होते हैं और इच्छा और घृणा के द्वंद्व से अभिभूत होते हैं।" (भगवद्गीता 7.27) भौतिक दुनिया में सभी जीव भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से प्रभावित होते हैं। यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा भी अच्छाई के गुण में हैं। इसी प्रकार, देवता आम तौर पर जोश के गुण में होते हैं और देवताओं से कमतर जीव, जैसे कि मनुष्य और पशु, अज्ञान के गुण या अच्छाई, जोश और अज्ञान के मिश्रित गुण में होते हैं। इसलिए अम्शुमान यह बताना चाहता था कि क्योंकि उसके चाचा, जो राख हो चुके थे, भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन थे, वे भगवान कपिलदेव को समझ नहीं पाए। उन्होंने प्रार्थना की, "क्योंकि तुम भगवान ब्रह्मा की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बुद्धि से भी परे हो, जब तक हमें आपकी कृपा से प्रबुद्ध नहीं किया जाता, तब तक हमें तुम्हें समझना संभव नहीं होगा।"

अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-

प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि

जानति तत्त्वं भगवन्-महिम्नो

ना चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्

"हे मेरे भगवान, यदि किसी पर आपके चरण कमलों की कृपा की थोड़ी सी भी निशानी पड़ जाए तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। लेकिन जो लोग भगवान को समझने के लिए अटकलें लगाते हैं, वे आपको जानने में असमर्थ होते हैं, भले ही वे कई वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।" (भागवत 10.14.29) भगवान, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, केवल उन्हीं के द्वारा समझा जा सकता है जिसे भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान को अन्य लोग नहीं समझ सकते।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)